Hypocrisy in Christianity

मसीहीयत में दिखावा | Hypocrisy in Christianity

कल जयपुर से दिल्ली गाड़ी चलाते हुए एक विचार मेरे अंदर आया। मैं प्रभु से बात करता आ रहा था और ज़ैक पुनन की सीडी भी गाड़ी में चल रही थी। उन्होंने एक छोटी सी प्रार्थना से वचन को बंद किया। मैं सोच रहा था कि प्रभु से जो हमारा रिश्ता है उसको प्रकट करने के तरीके में बहुत विविधता आ गई है। विविधता अपने आप में कोई गलत चीज़ नहीं है लेकिन एक तरफ भाई ज़ैक जैसे प्रचारक जो बहुत छोटी प्रार्थना करते हैं। और दूसरी तरफ वे जो बहुत लंबी लंबी प्रार्थना करते हैं और जिनके बोलने के तरीके में बहुत बनावट सी आ गई है, दोनों तो ठीक नहीं हो सकते। वो इसलिये, क्योंकि दोनों की सोच और प्रवृत्ति एक दम विपरीत है, स्वभाव एक दम अलग है।Hypocrite

मैं मानता हूँ कि परमेश्वर ने यूहन्ना 1:12 के अनुसार हमें अपनी संतान बना लिया है। और मैं पूछना चाहता हूँ कि हम में से कितने लोग अपने सांसारिक पिता से बात करते समय बहुत लल्लो-चप्पो करके अपने पिता से बात करते होंगे। लंबी बात करने से ही पिता समझेगा या खुश होगा ऐसा मानते होंगे? कितने लोग ऐसे होंगे जो अपने स्वाभाविक तरीके से बोलने के बजाय अपने पिता से बात करते वक्त किसी खास ही लहजे में, बहुत नीची या बहुत ऊँची आवाज में अपने पिता से बात करते होंगे। अपने बोलने में मिश्री घोलकर ही बात करते होंगे – जो ऐसा करते हैं उन पर शक होता है कि ज़रूर कुछ लालच है इसीलिये इतना मीठा बन रहा है – है या नहीं?

क्या विनती करने वाला व्यक्ति ऊँची आवाज में बोलता है?

प्रार्थना के समय मैं कई बार ऐसा महसूस करता हूँ कि कई लोग बहुत ऊँची आवाज में प्रार्थना करना पंसद करते हैं और चिल्ला-चिल्ला कर प्रार्थना करते हैं, यहाँ तक कि उनकी प्रार्थना से ऐसा लगता है जैसे प्रभु को डाँट रहे हों या प्रभु को आदेश दे रहे हों कि जैसा मैं कह रहा हूँ वैसा कर देना।

हालांकि मैं पूर्ण रूप से ऊँची आवाज़ में प्रार्थना करने का विरोध नहीं करता हूँ। जब किसी के मन में विलाप हो तो विलाप तो ऊँची आवाज़ में ही निकलता है। जब कोई फूट-फूटकर रोता है तो आहें भरकर ऊँची आवाज में चिल्लाकर रोता है। हमें भी अपने पापों के लिये ऐसा विलाप करना चाहिये – लेकिन मैंने अपने 20 साल के मसीही अनुभव में आज तक किसी को अपने पापों के लिये ऐसा विलाप करते नहीं सुना। ऊँची आवाज वाली सभी प्रार्थनाएं दूसरों के लिये – विनती प्रार्थना करते हैं या छुटकारे की प्रार्थना करते हैं। विनती तो नम्र शब्दों में होनी चाहिये और ऐसे शब्दों में जिनमें ईमानदारी झलकती हो।

क्या परमेश्वर सधी हुई भाषा और भारी भरकम शब्दों के इस्तेमाल से प्रभावित होते होंगे?

इसके अलावा कई लोग बहुत ही सधी हुई भाषा में, कुछ खास शब्दों का उपयोग करते हुए ही प्रार्थना करते हैं। कुछ लोग बहुत ही मक्खन लगाकर और बहुत ही भारी शब्दों में प्रार्थना करते हैं जिनसे मनुष्य प्रभावित हो जाते हैं। परंतु क्या परमेश्वर भी ऐसी सधी हुई भाषा और भारी भरकम शब्दों के इस्तेमाल से प्रभावित होते होंगे? प्रभु ने कहा कि अन्यजाति ऐसा समझते हैं कि लंबी प्रार्थनाओं और भारी-भरकम शब्दों से उनकी सुनी जायेगी परंतु विश्वासी को तो ऐसा नहीं करना चाहिये।

ऐसी भाषा या शैली का उपयोग इंसान तभी करता है जब वह किसी को प्रभावित करना चाहता है – क्या सच में हम अपने परमेश्वर को खुश करने के लिये ही ऐसी प्रार्थना करते हैं और ऐसे दिखावे वाला जीवन जीते हैं। सच यह है कि परमेश्वर के लिये इन सब चीजों का कोई महत्व ही नहीं है।

धार्मिक या लापरवाह

इसके अलावा बहुत ही ज्यादा धार्मिक बन जाना या पूरी तरह से लापरवाह हो जाना भी गलत है। परमेश्वर के साथ रिश्ता बहुत सरल और खुला (ईमानदार) होना चाहिये। मेरे विचार में जो ज्यादा धार्मिक हो जाते हैं, वे कई बार बाहरी तौर पर ही ऐसा कर रहे होते हैं और अन्दर से उनके विचारों में, स्वभाव में, जीवन में कोई परिवर्तन नहीं होता – वे दूसरों को आत्मिक रूप से नीचा करके देखने लगते हैं। यदि वे सफेद कपड़े पहनते हैं तो रंगीन कपड़े पहनने वालों का न्याय करने लगते हैं। खुद टीवी नहीं देखते तो देखने वालों का न्याय करने लगते हैं। बाहरी कामों से परमेश्वर प्रभावित नहीं होता परंतु धार्मिक प्रवृत्ति के लोग बहुधा बाहर के कामों में ही उलझे रहते हैं।

अगर सफेद कपड़ों से ही धार्मिकता होती तो बहुत आसान होती – सभी एक साथ सफेद कपड़े सिलवा लेते और सब एक साथ ही पवित्र हो जाते – प्रभु यीशु को अपना खून न बहाना पड़ता। पवित्रता इतनी सस्ती नहीं है। मैं सरलता का विरोधी नहीं हूँ परंतु बाहरी सरलता कहीं हमारे आंतरिक जीवन को जटिल तो नहीं बना रही है – सोचने का विषय है।

मसीही समाज में और हम मसीही लोगों में बहुत दिखावा आ गया है, जिसे प्रभु यीशु पाखंड का दर्जा देते थे और मैं उसे फरीसी का आत्मा मानता हूँ। अपने आपको बाहरी रूप से बदल लेना, दूसरों के सामने अच्छा दिखने की चाहत रखना और लोगों से तारीफ पाने की चाहत रखना – यह सब दिखावा है। परमेश्वर हमारे इस दिखावे से खुश होना तो दूर बल्कि नाराज होता है।

परंतु साथ ही साथ पूरी तरह से प्रभु से अपने रिश्ते के प्रति लापरवाह हो जाना, हर इतवार चर्च ना जाना, समय पर सभा में न पहुँचना, दैनिक रूप से बाइबल ना पढ़ना, नियमित प्रार्थना ना करना, प्रेम-क्षमा-दया-सहनशीलता-दयालुता आदि गुणों में न बढ़ना भी अच्छी बात नहीं है। परमेश्वर को इससे दुख होता है। यह नहीं कि इससे परमेश्वर का कुछ नुकसान है परंतु नुकसान हमारा है – लेकिन दुखी परमेश्वर होता है जैसा परिवार का बच्चा यदि गलत रास्ते पर चला जाये या आलसी / लापरवाह हो जाये और समय से न पढ़े या नौकरी आदि न करे तो परिवार दुखी होता है।

परमेश्वर हमारे साथ एक सरल रिश्ता बनाने का इच्छुक है। हम सांसारिक रिश्तों से समझ सकते हैं कि कैसे एक सरल रिश्ते में न तो ज़रूरत से ज्यादा मिश्री घोलकर बोलने की ज़रूरत होती है न किसी प्रकार के नियमों के प्रति बाध्य हो जाने की। सरल रिश्ते में इमानदारी होती है, आंतरिक प्रेम होता है जो स्वभाव, मेल-जोल, बात-चीत आदि सब बातों में झलकता है। आइये, परमेश्वर के साथ एक सरल रिश्ता बनायें और आत्मिकता में बढ़ते जायें ताकि परमेश्वर को हमारे जीवन से प्रसन्नता हो और सारी महिमा परमेश्वर को मिले।

यीशु मसीह की जय

chorotia