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पाप की शुरुआत | Beginning of Sin

पहला पाप

हम जब पाप के विषय में बात करते हैं तो मानते हैं कि पहला पाप तब हुआ जब आदम और हव्वा ने परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन किया और वह प्रतिबंधित फल खा लिया (भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल – सेब नहीं) जिसे खाने के लिये परमेश्वर ने आदम को मना किया था। आदम को इस बात को अत्यंत महत्वपूर्ण मानना चाहिये था और हव्वा को भी उसका महत्व समझाना चाहिये था – परंतु दोनों ने ही इस बात को हल्के में लिया और शैतान के बहकावे में आ गये – और पाप किया। असल में उन्होंने इस बात पर विश्वास नहीं किया कि परमेश्वर भला है और जिस चीज से उन्हें दूर रखा है वह उनके लिये भला है बल्कि शैतान की बात को मान लिया कि शायद परमेश्वर सच में उतना भला नहीं जितना वे मानते थे तभी तो उनको उस फल से वंचित रखा जो देखने में अच्छा है और मनभाऊ है (उत्पत्ति 3:6)।

हम भी बहुत बार शैतान के इस बहकावे में आकर परमेश्वर पर उतना भरोसा नहीं रखते जितना कि आराधना के समय गीत गाते समय बोलते हैं और किताबी तौर पर दूसरों को बताते हैं।

खास तौर पर जब परेशानियाँ घेर लेती हैं और प्रार्थना के उत्तर नहीं मिलते तो शक मन में घर करने लगता है। यह बात बार बार मन में उठती है कि क्या परमेश्वर ने छोड़ दिया है, क्या मुझ में कोई पाप है, क्या परमेश्वर मुझे दंड दे रहा है – जबकि परमेश्वर हमारे कामों के कारण पहले भी प्रभावित नहीं था जब हमारे पापों की कीमत चुकाने के लिये उसने अपने पुत्र को भेजा था ताकि हमारे बदले में अपने प्राण दे। हमारे पापों या भले कामों के कारण नहीं बल्कि प्रभु यीशु के लहू के कारण हम धर्मी है और हमारा सारा दंड तो पहले ही लिया जा चुका है। हम भूल जाते हैं कि परमेश्वर भला है।

पाप की शुरूआत

खैर, अभी का असल मुद्दा यह है कि हम सभी मानते हैं कि पहला पाप अदन की वाटिका में हुआ। लेकिन परमेश्वर की तरफ से एक प्रकाशन मिला जिसके कारण मैं यह समझ पाया कि मनुष्य से पहला पाप ज़रूर अदन की वाटिका में हुआ था, परंतु पाप का उद्भव अर्थात पाप की शुरुआत वहाँ से नहीं हुई थी। मैं कई बार समझाते हुए एक बात बहुत बोलता हूँ कि चोरी, व्यभिचार, घमंड आदि पाप नहीं है बल्कि पाप के फल हैं – असली पाप तो परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता है। लेकिन आज मेरी समझ में एक बात आई कि पाप कि शुरूआत तो उस दिन स्वर्ग में हुई थी जहाँ लूसीफर ने अपने मन में घमंड किया और परमेश्वर से भी ऊपर अपना सिंहासन लगाने की चेष्ठा की। तो घमंड तो अनाज्ञाकारिता से भी पहला पाप है।

फिर जब अदन की वाटिका में सर्प आया और हव्वा को बहकाने लगा तो उसने परमेश्वर के वचन को तोड़-मरोड़कर पेश किया अर्थात धोखा दिया और झूठ भी बोला कि तुम अवश्य ही नहीं मरोगे (उत्पत्ति 3:4)। यह सब पापकर्म अनाज्ञाकारिता के पाप से भी पहले हुए इसका मतलब सिर्फ अनाज्ञाकारिता ही पाप नहीं है (हालांकि मनुष्यों के लिये यह सबसे पहला और सबसे घिनौना पाप है), उससे भी पहला पाप यही है – कि परमेश्वर को परमेश्वर ना माना जाये और यह न माना जाये कि परमेश्वर भला है। परमेश्वर को सर्वोच्च स्थान न देना और उस पर भरोसा ना करना और भी बड़ा और पहला पाप है – वही पाप जो शैतान ने किया और जहाँ से पाप की शुरुआत हुई। घमंड, लालच, फरेब और झूठ वो वाहन हैं जिनसे शैतान ने इस पाप को अपने जीवन में और फिर मनुष्य जाति के जीवन में फलवंत किया।

आज भी जब हम पाप करते हैं तो पहले असल में हम अनाज्ञाकारिता से भी पहले यही पाप करते हैं कि मन में मान लेते हैं कि परमेश्वर भला नहीं इसीलिये जीवन में दुख आया, उस पर भरोसा नहीं करते कि हमारी हरेक बुरी परिस्थिति से निकालने व आशीष देने में वह सक्षम है – तभी हम अपने प्रयास पर विश्वास करते हैं और कुछ ना कुछ रास्ता अपनी समझ (और चतुराई) से निकालने का प्रयास करते हैं – जबकि सर्प ही था जो सभी वनैले पशुओं में सबसे चतुर था और फिर भी शैतान की योजनाओं को पूरा करने वाला वाहक बना था। प्रभु का वचन कहता है कि अपनी समझ का सहारा ना लेना (नीतिवचन 3:5-6) लेकिन फिर भी उस बात को नहीं मानते और फिर दूसरा पाप करने लगते हैं जो कि अनाज्ञाकारिता का पाप है।

विचार करें और देखें कि कहीं आपने भी परमेश्वर पर संदेह तो नहीं किया है, कहीं उसके भले होने पर आपको कोई संशय तो नहीं है, क्या आप उस पर विश्वास करते हैं और भरोसा भी। क्या आप अनाज्ञाकारिता के पाप में फंसे हैं? शैतान ने कहा था कि अनाज्ञाकारिता कर लो तो भी तुम अवश्य ही नहीं मरोगे, लेकिन वो (शरीर में तो नहीं, परंतु) आत्मिक रूप से उसी समय मर गये। आज भी परमेश्वर का वचन कहता है कि यदि तुम शरीर के अनुसार दिन काटोगे तो मरोगे… (रोमियों 8:13) परंतु शैतान कहता है कि तुम नहीं मरोगे – आप किसकी बात पर विश्वास करते हैं?

प्रभु इस वचन के द्वारा हम सबको आशीष दे और पवित्र आत्मा की सामर्थ से भरे ताकि आत्मिक जीवन में हम जय पायें। प्रभु यीशु के नाम से। आमीन

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